it's me...
Just a random guy, bit of a loner, like to speak only when spoken to. But there are some places where, i like to speak without being asked to. This, my friends, is such a place.
रविवार, 14 अक्टूबर 2018
हवाओं के शहर में - 3
हवाओं के शहर में - 2
एक घंटे में भोजन कर हम लोग पास ही मौजूद अल्बर्ट हॉल म्यूजियम घूमने गए.
खैर, किसी म्यूजियम में क्या क्या पाया जाता है ये आप लोगों से कुछ छिपा तो नहीं है पर फिर भी कुछ जगहें जो मुझे बहुत पसंद आती हैं उनमें से एक है म्यूजियम, तो इस बारे में कुछ तो बताऊँगा ही.
म्यूजियमों में हमारे रोमांचक इतिहास की जो थाती रखी होती है वो मुझे हमेशा से अपनी ओर खींचते आई है. म्यूजियम हमारी सभ्यता के दर्पण हैं, अगर कोई इनमें झाँकना चाहे तो इतिहास के कई ऐसे पहलुओं से दो-चार हुआ जा सकता है जो कई दफ़ा कल्पनातीत होते हैं.
राजस्थान का तो इतिहास ही राजपूताना से संबद्ध है इसलिए यहाँ के महाराजाओं ने बाहरी आक्रमणों को झेलते हुए भी जो सभ्यता की धरोहर यहाँ महफूज़ रखी है हमें उसके लिए उनका आभारी होना चाहिए.
मिसाल के तौर पर नीचे की तस्वीर देखिए, ये मुग़लिया दौर का एक खंज़र है, उस दौर में ये एक आम ज़रूरत की चीज़ होगी मगर इसकी धार के ऊपर उभारी हुई इस नक़्क़ाशी ने बार बार मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा.
हवाओं के शहर में
हवाओं के शहर में - 1
जयपुर को वैसे तो लोग इस नाम से नहीं बुलाते, इसे गुलाबी शहर के नाम से जाना जाता है पर मैं जयपुर को हवाओं का शहर कहना पसंद करूँगा.
कारण – आप पूछेंगे, भई, एक नाम तो है चिरपरिचित, गुलाबी शहर, फिर एक और नाम क्यों देना?
मैं कहता हूँ, क्या हम इंसान हमेशा किसी एक पहचान के मोहताज रहते हैं, फिर शहर भला किसी बंधी बंधाई हुई पहचान से क्यों बंधे रहें?
जैसे हर किसी के लिए किसी जगह के मायने कुछ न कुछ अलग हो सकते हैं वैसे ही जयपुर मेरे लिए हवाओं का शहर है.
क्योंकि यहाँ मौजूद उस एक जगह – हवा महल को देखने का एक अलग ही कौतूहल मुझे हमेशा से रहा. जब मैं पड़ोस में कोटा में रहता था तब भी कभी जयपुर न जा सका जिसके चलते हवा महल देखने का अवसर प्राप्त न हुआ.
कहते हैं हवा महल जयपुर के राजमहल का जनाना निवास था.
लाल और गुलाबी (आप क्या कुछ और उम्मीद पाले बैठे थे, यूँ ही तो इस शहर को गुलाबी शहर नहीं कहते) बलुए पत्थरों की बनी इस इमारत में तकरीबन 953 खिड़कियाँ हैं जिन के पीछे बैठ पर्दानशीं स्त्रियाँ शहर की गलियों को निहारा करती थीं.
खैर, बात तो अभी जयपुर की ही शुरू हुई थी और देखिए न, मैं सीधे आपको हवा महल पर ले आया.
वैसे आज 13 अक्टूबर को दोपहर में दो बजे ही तो हम जयपुर पहुँचे.
जिस होटल में ठहरने का प्रबंध था उसको खोजने में अलग से आधा घंटा खप गया.
कलेक्टरेट चौराहे के पास ही मौजूद यह होटल Park Inn देखने में अच्छा लग रहा था और इसके कमरे भी आरामदायक लगते हैं.
क्रमशः
मंगलवार, 31 जुलाई 2018
हो न हो
जी भर के देख लेने दे, आज इस चाँद को,
कल का क्या भरोसा, ये रात हो न हो.
पैमाने न हटा, पीने दे हमें ऐ साक़ी,
ज़िन्दगी का क्या भरोसा, कल हो न हो.
मैं जा नहीं सकता, किसी की राह देखता हूँ,
तक़दीर का क्या भरोसा, फिर ये मुलाकात हो न हो.
गुरुवार, 17 मई 2018
अनकिया वादा
अनकिया वादा
वो बरसात के दिन थे.
समीर अपने मकान के ऊपरी कमरे में बिस्तर पर लेटा था. बाहर कुछ ही देर पहले जम कर बारिश हुई थी. बरसात होने पर मिट्टी की सोंधी सोंधी ख़ुशबू हवा में फैली थी जो कि उस को पसंद थी. बाहर के पीपल के पत्तों पर बरसात का पानी रह रह कर मोतियों के माफ़िक़ चमकता था.
कहने को तो वो समीर का सोने का कमरा था पर इस कमरे में उस के दिन का अधिकतर वक़्त गुज़रता था.
कमरे में नामालूम सा गमगीन माहौल फैला था.
वो चिलम जिसे वो बस स्टॉप से लाया था और हर वक़्त होंठों से लगाए रखता था आज वो किसी परित्यक्ता की मानिंद एक ओर रखा हुआ था.
आज रह रह के उसे ज़ेबू की याद आ रही थी. ज़ेबू यानी ज़ेबुन्निसा.
ऐसे ही एक बरसात के दिन ज़ेबुन्निसा ने उस का हाथ थाम कर कहा था, "समीर, मैं अब्बाज़ान से हमारे बारे में बात करने जा रही हूँ. ख़ुदा ने चाहा तो हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता. और अगर ऐसा न हुआ तो मैं अपनी जान दे दूँगी."
ज़ेबुन्निसा जब बोलती थी तो उसके गुलाबी होंठों के पीछे मोतियों जैसी दंतपंक्तियाँ झिलमिलाती थीं.
खिड़की के पास खड़े होने के चलते जब हवा से उस के खुले बाल हवा में लहराते तो लगता जैसे बरसात के पहले की घटाएँ उस के कमरे में ही आ गयी हों.
समीर सोचता ही रह गया कि आख़िर वो ऐसा कोई भी वादा ज़ेबुन्निसा को क्यों नहीं दे सका?
फिर जो ज़ेबुन्निसा गयी तो कभी न लौट के आयी.
आयी तो उस के इंतक़ाल की ख़बर.
उसके अब्बू और बड़े भाई ने मिल कर ख़ानदान की इज़्ज़त बचाने के लिए उस की हत्या कर दी थी.
उस का क़सूर सिर्फ़ इतना था के उस ने परिवार की स्थापित मर्यादाओं को तोड़ कर एक हिंदू से प्रेम किया था.
परिवार की इज़्ज़त! परिवार की मर्यादा!
क्या ये सब इतने कमज़ोर हैं के किसी के किसी से प्रेम कर लेने भर से बर्बाद हो जाते हैं?
इजलास में ज़ेबुन्निसा की हत्या का मुक़दमा चला.
समीर भी मुक़दमे की कार्यवाही देखने मौजूद था.
ज़ेबुन्निसा के अब्बा और बड़ा भाई दोनों इस अकड़ के साथ आए थे मानो ये जुर्म नहीं बड़े सबाब का काम किया हो.
ज़ेबुन्निसा की माँ ने अपने शौहर और बेटे पर लगे सभी इल्ज़ाम वापिस ले लिए.
वो दोनों छूट गए.
समीर उनके पीछे ही कचहरी से बाहर निकला.
थोड़ी आगे जा कर उस ने उन को आवाज़ दे कर रोका.
ज़ेबुन्निसा के माँ-बाप और भाई समीर की आस्तीन में रखी पिस्तौल को देख कर मारे डर के काँपने लगे.
अभी कोई कुछ कर पाता उस से पहले ही समीर ने बंदूक़ का रूख अपनी ओर कर ख़ुद के सीने में गोली मार ली.
ज़ोर का धमाका हुआ तो वहाँ लोगों की भीड़ जुट गयी. सभी उस आशिक़ की लाश देखने इकट्ठे होने लगे थे जिस ने अपनी माशूका से अनकिया वादा अपनी जान दे कर निभा दिया.
सभी के होंठों पर एक ही बात थी - जिस इश्क़ में दीवानापन न हो वो इश्क़ नहीं.
कई वादे किए नहीं जाते, सिर्फ़ निभाए जाते हैं.
जाते हैं
जाते हैं
इक दिन सब कुछ छोड़छाड़ के,
दुनियावी बंधन तोड़ताड़ के,
बुद्ध की राह पे,
हम चले जाएँगे.
पीछे छोड़ जाएँगे,
ये संगदिल, फ़रेबी,
दोज़ख़ी दुनिया.
तब तुम मुझे न याद करना प्रिये,
क्यूँकि मैं नहीं आऊँगा,
मैं नहीं आऊँगा,
मैं वापिस नहीं आऊँगा.
जाते हैं हम,
तेरी इस बेमुरौव्वत, ग़मकार,
बेरूखी भरी जाहिल दुनिया को छोड़.
जाते जाते इतना सुनते जाओ,
जब कभी जीना भारी लगने लगे,
किसी दरख़्त या बहती पवन से मेरा नाम लेना.
मैं सिर्फ़ ख़्वाबों में मिलूँगा.
क्यूँकि मैं नहीं आऊँगा,
मैं नहीं आऊँगा,
मैं अब कभी वापिस नहीं आऊँगा.
ख़ुद से ख़ुद का इक वादा
ख़ुद से ख़ुद का इक वादा
जब वफ़ाएँ सूली चढ़ जाती हैं, जब आशिक़ी रास नहीं आती,
जब घुट घुट के रोते रोते, हमको ये ज़िंदगी रास नहीं आती,
तब हिकारतों की सेज पे, मुहब्बत काँटों का ताज पहनाती है,
तब नफ़रत की चिंगारी ये, अरमानों को ख़ाक मिलाती है.
हम उसी वफ़ा की सूली पे, हँसते हँसते चढ़ जाएँगे,
हम घुट घुट के रो लेंगे पर, नाम तेरा इन होंठों पे भूले से भी न लाएँगे.
हमने कर के है देख लिया, सब कहते जिसे हैं मर्ज़ ए मुहब्बत,
हमने सह के देख लिया, हैं कहते जिसे सब दर्द ए मुहब्बत.
अब कभी न किसी से होगी मुहब्बत, ख़ुद से ख़ुद का वादा रहा,
अब कभी न किसी की करनी सोहबत, ये तो अब अपना इरादा रहा.
गुरुवार, 29 मई 2014
जनादेश 2014 - महत्वाकांक्षी भारत की अभिव्यक्ति
जिस प्रकार पुरानी सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खुलती जा रही थी, उससे यह तो निश्चित था कि कांग्रेसनीत सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की स्थिति इस बार अच्छी नहीं थी और कोई चमत्कार ही उन्हें पराजय से बचा सकता था। परंतु संप्रग नेता श्री राहुल गाँधी का व्यक्तित्व जनता को रास नहीं आया। इतने कुछ के पश्चात भी शायद किसी ने भी कभी उम्मीद नहीं की होगी कि वे कांग्रेस की ऐसी स्थिति के गवाह बनेंगे। संप्रग की कुल 60 सीटें आईं जिनमे से 44 कांग्रेस की थी। कुछ राज्यों में कांग्रेस का खाता भी न खुल सका।
अब जबकि नए मंत्रिमंडल ने कार्यभार संभाल लिया है तो देश की राजनीति में आए इस स्पष्ट मोड़ को संभव बनाने वाले एक अतिमहत्वपूर्ण कारक पर दृष्टिपात करना अत्यावश्यक जान पड़ता है। वह कारक है - सोशल मीडिया। अर्थात इंटरनेट पर जनता का आपस में संपर्क। यह कहना कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं समझा जाएगा कि भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी ने जिस सहजता के साथ इस संचार माध्यम का प्रयोग किया वह उनकी विजय का एक महत्वपूर्ण कारण बना। वजह - तेजी से युवा होते इस राष्ट्र के बड़ी संख्या मे युवा फेसबुक, ट्विटर आदि का प्रयोग करने लगे हैं। श्री मोदी ने सीधे इस वर्ग से संवाद स्थापित किया और महत्वाकांक्षाओं से भरे इस वर्ग का जैसा सहयोग उन्हें मिला वह इस विजय में निर्णायक भूमिका से कम नहीं रहा। साथ ही साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से श्री मोदी को अभूतपूर्व सहयोग दिया।
इस विजय ने कई सत्यों को उजागर करने का काम किया है। सर्वप्रथम तो यही कि आज का युवा भारत जितना महत्वाकांक्षी है उतना ही संवेदनशील भी है। अब जो विचार और नीतियाँ इस वर्ग को पसंद नहीं आती उन्हें नकार देने का युवा पीढ़ी ने स्पष्ट आदेश दिया है।
इस बार राजनीति की यह जंग हर मोर्चे पर लड़ी जा रही थी। सोशल मीडिया तो जैसे दो फाड़ हो गया था। यह श्री मोदी के प्रचार अभियान का परिणाम था कि कोई भी तटस्थ रह नहीं सका। जब इस तरह प्रचार किए जाएं तो स्पष्ट जनादेश आना ही एकमात्र निष्कर्ष है - यह चुनाव युवा पीढ़ी को यह पाठ पढ़ा गया। तीस वर्षों के पश्चात किसी दल ने स्पष्ट बहुमत पाया है, यह इसी की परिणति है।
युवा पीढ़ी के हाथों में यह शस्त्र अभी और कितने राजनीतिक दिग्गजों की नौका डुबोएगा यह भी क्या कोई निश्चित होकर कह सकता है।
जितना ऊपर कहा सत्य है उतना ही यह भी कि अब शायद नीति-नियंताओं को आत्मावलोकन की आवश्यकता है। यह युवा पीढ़ी सिर्फ सपने देखने वाली नहीं है, अपितु इस पीढ़ी के पास ऐसा शस्त्र है जो कहीं से भी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। जो पराजित हुए हैं उन्हें तो स्वयं को पुनः प्रासंगिक बनने के लिए प्रयत्न करने ही होंगे अपितु जो जीते हैं उन्हे भी विजय के उत्साह में यह ध्यान रखना होगा कि मुकुट तक पहुँचने के मार्ग से कहीं अधिक दुष्कर होता है शासन चलाना। कंचन के बिस्तर पर कर्मयोग के ह्रास का सदैव भय रहता है। नतीजा - पराजय। और यह एक सत्य है, सार्वभौमिक, परिवर्तनशीलता इसी का दूसरा नाम है।
मराठी लेखक श्री शिवाजी सावंत की अमर कथा 'मृत्युंजय' की एक उक्ति कदाचित् इसी तथ्य पर है-
' यों तो इस संसार में न तो कोई जेता होता है, न ही जित, यही सत्य है।'
इसी प्रकार हम आपको और समाज को अपने कर्तव्यों का भान कराते रहेंगे।
-
मयंक आकाश
(मई २९, २०१४)
सोमवार, 10 फ़रवरी 2014
दिन पर दिन बीत गए...
पिछली बार जहाँ पर वार्तालाप समाप्त हुआ था तब लेखक कालेज में था। अब तो तीन वर्षों का अंतराल आ गया है। नौकरी करते तीन वर्ष होने को हैं। इस बीच कई प्रसंग हुए। कुछ अनुभव भी हुआ - अच्छे और बुरे की श्रेणी में डालना तो नहीं चाहूँगा पर, सीखने को बहुत कुछ मिला। अब तो कदाचित् इस वर्ष विवाह भी हो। विवाह तो स्वयं में एक अलग अनुभव है, जीवन में कई वृहत् परिवर्तनों में से एक। परंतु इस विषय में अभी इतना ही कहना पर्याप्त है। कभी और इस विषय में विस्तार से चर्चा होगी।
इधर घटनाक्रम पर दृष्टिपात करता हूँ तो पाता हूँ कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वह एक गंभीर वैचारिक उथलपुथल में फंसा है। उच्चाकांक्षाएँ एक दूसरे से टकरा रही हैं। यह उथलपुथल धीरे - धीरे हमें एक ज्वालामुखी के मुख पर पहुंचा रही है। आंतरिक असंतोष धीरे - धीरे उन मूल्यों को खोखला किए जा रहा है जिनपर एक स्वस्थ समाज की नींव रखी होती है। कहते हैं रोग के निदान का प्रथम चरण स्वयं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। तब तो शायद हमें भी भीतर झाँकने की आवश्यकता है।
अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मिलकर करें तो क्या नहीं कर सकते? जरूरत तो ईमानदारी से प्रयास करने की है। आखिर यह सब सिर्फ़ हितोपदेश तो है नहीं। तो चलिए देखें सफलता का मार्ग कहाँ से होकर जाता है।
मयंक आकाश (१० फरवरी, २०१४)
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
तुम कौन हो...
तुम कौन हो...
क्यों मेरे ख्वाबों में आकर,
मेरी नींद चुरा लेती हो??
जबसे तुमसे नज़रें मिली हैं,
लगता है जैसे एक बेचैनी सी,
दिल में घर कर गयी है....
दिल अपना ना रहा,
आँखें चाहती हैं,
बस तुम्हारा चेहरा सामने हो.
समझ नहीं आता,
क्या यह प्यार है,
जो मुझे तुमसे हुआ है...
तुम बिन जी नही लगता,
तुम सामने हो तो,
खो सा जाता हूँ...
पर इससे ज्यादा भी मैंने,
कुछ खोया है,
मेरी रातों की नींद और चैन,
खोया है...
तुम साथ हो तो लगता है,
ये पल कभी न ख़त्म हो...
ये समय रुक जाए,
और इस मुलाक़ात के साथ ही,
सब कुछ ख़त्म हो जाए...
फिर न यूँ तन्हाई होगी,
क्योंकि तुम तो हर वक़्त मेरे पास होगी...
क्या यह सचमुच में इश्क है,
जो मुझे तुमसे हो गया है??
मत सताओ मुझे,
मेरी हसरतों ने मुझे,
कहीं का नहीं छोड़ा॥
हर कदम कदम पर तुम्हारे,
निशाँ खोजता फिरता हूँ...
इस उम्मीद में जीता हूँ,
कि कभी तो वो दिन आएगा,
जब तुम मेरी होगी...और मैं तुम्हारा...
मेरी ख़्वाबों में रहने वाली,
ओ परियों जैसी,
मेरे सपनों की राजकुमारी,
तुम मेरे दिल में बस चुकी हो,
सांस बनकर जिस्म में उतर चुकी हो...
मुझे तुमसे बस इतना कहना है,
तुम जो भी हो,
शायद मेरे लिए ही बनी हो...
मुझे इतना तो बता दो,
कि तुम कौन हो.....
I LOVE YOU...FROM THE DEPTHS OF MY HEART.
P.S.: DEAR FRIENDS, SOMETIMES I TRY MY HAND AT POEM WRITING..THIS IS ONE OF SUCH..PLEASE BE GENEROUS IN COMMENTING.









