ख़ुद से ख़ुद का इक वादा
जब वफ़ाएँ सूली चढ़ जाती हैं, जब आशिक़ी रास नहीं आती,
जब घुट घुट के रोते रोते, हमको ये ज़िंदगी रास नहीं आती,
तब हिकारतों की सेज पे, मुहब्बत काँटों का ताज पहनाती है,
तब नफ़रत की चिंगारी ये, अरमानों को ख़ाक मिलाती है.
हम उसी वफ़ा की सूली पे, हँसते हँसते चढ़ जाएँगे,
हम घुट घुट के रो लेंगे पर, नाम तेरा इन होंठों पे भूले से भी न लाएँगे.
हमने कर के है देख लिया, सब कहते जिसे हैं मर्ज़ ए मुहब्बत,
हमने सह के देख लिया, हैं कहते जिसे सब दर्द ए मुहब्बत.
अब कभी न किसी से होगी मुहब्बत, ख़ुद से ख़ुद का वादा रहा,
अब कभी न किसी की करनी सोहबत, ये तो अब अपना इरादा रहा.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें