रविवार, 14 अक्टूबर 2018

हवाओं के शहर में

हवाओं के शहर में - 1

जयपुर को वैसे तो लोग इस नाम से नहीं बुलाते, इसे गुलाबी शहर के नाम से जाना जाता है पर मैं जयपुर को हवाओं का शहर कहना पसंद करूँगा.
कारण – आप पूछेंगे, भई, एक नाम तो है चिरपरिचित, गुलाबी शहर, फिर एक और नाम क्यों देना?
मैं कहता हूँ, क्या हम इंसान हमेशा किसी एक पहचान के मोहताज रहते हैं, फिर शहर भला किसी बंधी बंधाई हुई पहचान से क्यों बंधे रहें?
जैसे हर किसी के लिए किसी जगह के मायने कुछ न कुछ अलग हो सकते हैं वैसे ही जयपुर मेरे लिए हवाओं का शहर है.
क्योंकि यहाँ मौजूद उस एक जगह – हवा महल को देखने का एक अलग ही कौतूहल मुझे हमेशा से रहा. जब मैं पड़ोस में कोटा में रहता था तब भी कभी जयपुर न जा सका जिसके चलते हवा महल देखने का अवसर प्राप्त न हुआ.
कहते हैं हवा महल जयपुर के राजमहल का जनाना निवास था.
लाल और गुलाबी (आप क्या कुछ और उम्मीद पाले बैठे थे, यूँ ही तो इस शहर को गुलाबी शहर नहीं कहते) बलुए पत्थरों की बनी इस इमारत में तकरीबन 953 खिड़कियाँ हैं जिन के पीछे बैठ पर्दानशीं स्त्रियाँ शहर की गलियों को निहारा करती थीं.
खैर, बात तो अभी जयपुर की ही शुरू हुई थी और देखिए न, मैं सीधे आपको हवा महल पर ले आया.
वैसे आज 13 अक्टूबर को दोपहर में दो बजे ही तो हम जयपुर पहुँचे.
जिस होटल में ठहरने का प्रबंध था उसको खोजने में अलग से आधा घंटा खप गया.
कलेक्टरेट चौराहे के पास ही मौजूद यह होटल Park Inn देखने में अच्छा लग रहा था और इसके कमरे भी आरामदायक लगते हैं.

क्रमशः

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें