गुरुवार, 17 मई 2018

अनकिया वादा

अनकिया वादा

वो बरसात के दिन थे.

समीर अपने मकान के ऊपरी कमरे में बिस्तर पर लेटा था. बाहर कुछ ही देर पहले जम कर बारिश हुई थी. बरसात होने पर मिट्टी की सोंधी सोंधी ख़ुशबू हवा में फैली थी जो कि उस को पसंद थी. बाहर के पीपल के पत्तों पर बरसात का पानी रह रह कर मोतियों के माफ़िक़ चमकता था.

कहने को तो वो समीर का सोने का कमरा था पर इस कमरे में उस के दिन का अधिकतर वक़्त गुज़रता था.

कमरे में नामालूम सा गमगीन माहौल फैला था.

वो चिलम जिसे वो बस स्टॉप से लाया था और हर वक़्त होंठों से लगाए रखता था आज वो किसी परित्यक्ता की मानिंद एक ओर रखा हुआ था.

आज रह रह के उसे ज़ेबू की याद आ रही थी. ज़ेबू यानी ज़ेबुन्निसा.

ऐसे ही एक बरसात के दिन ज़ेबुन्निसा ने उस का हाथ थाम कर कहा था, "समीर, मैं अब्बाज़ान से हमारे बारे में बात करने जा रही हूँ. ख़ुदा ने चाहा तो हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता. और अगर ऐसा न हुआ तो मैं अपनी जान दे दूँगी."

ज़ेबुन्निसा जब बोलती थी तो उसके गुलाबी होंठों के पीछे मोतियों जैसी दंतपंक्तियाँ झिलमिलाती थीं.

खिड़की के पास खड़े होने के चलते जब हवा से उस के खुले बाल हवा में लहराते तो लगता जैसे बरसात के पहले की घटाएँ उस के कमरे में ही आ गयी हों.

समीर सोचता ही रह गया कि आख़िर वो ऐसा कोई भी वादा ज़ेबुन्निसा को क्यों नहीं दे सका?

फिर जो ज़ेबुन्निसा गयी तो कभी न लौट के आयी.

आयी तो उस के इंतक़ाल की ख़बर.

उसके अब्बू और बड़े भाई ने मिल कर ख़ानदान की इज़्ज़त बचाने के लिए उस की हत्या कर दी थी.

उस का क़सूर सिर्फ़ इतना था के उस ने परिवार की स्थापित मर्यादाओं को तोड़ कर एक हिंदू से प्रेम किया था.

परिवार की इज़्ज़त! परिवार की मर्यादा!

क्या ये सब इतने कमज़ोर हैं के किसी के किसी से प्रेम कर लेने भर से बर्बाद हो जाते हैं?

इजलास में ज़ेबुन्निसा की हत्या का मुक़दमा चला.

समीर भी मुक़दमे की कार्यवाही देखने मौजूद था.

ज़ेबुन्निसा के अब्बा और बड़ा भाई दोनों इस अकड़ के साथ आए थे मानो ये जुर्म नहीं बड़े सबाब का काम किया हो.

ज़ेबुन्निसा की माँ ने अपने शौहर और बेटे पर लगे सभी इल्ज़ाम वापिस ले लिए.

वो दोनों छूट गए.

समीर उनके पीछे ही कचहरी से बाहर निकला.

थोड़ी आगे जा कर उस ने उन को आवाज़ दे कर रोका.

ज़ेबुन्निसा के माँ-बाप और भाई समीर की आस्तीन में रखी पिस्तौल को देख कर मारे डर के काँपने लगे.

अभी कोई कुछ कर पाता उस से पहले ही समीर ने बंदूक़ का रूख अपनी ओर कर ख़ुद के सीने में गोली मार ली.

ज़ोर का धमाका हुआ तो वहाँ लोगों की भीड़ जुट गयी. सभी उस आशिक़ की लाश देखने इकट्ठे होने लगे थे जिस ने अपनी माशूका से अनकिया वादा अपनी जान दे कर निभा दिया.

सभी के होंठों पर एक ही बात थी - जिस इश्क़ में दीवानापन न हो वो इश्क़ नहीं.

कई वादे किए नहीं जाते, सिर्फ़ निभाए जाते हैं.

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