रविवार, 14 अक्टूबर 2018

हवाओं के शहर में - 3

इस धनुष-बाण में जो दुधारी तलवार की माफिक एक बाण है उसने अचंभित किया क्योंकि ऐसी कोई चीज़ मैंने कभी नहीं देखी थी. ये भी किसी राजपूत राजा की थी.



इन लाल बर्तनों को 19वीं सदी की उस्मानी ख़िलाफ़त की राजधानी इस्तांबुल (क़ुस्तुन्तुनिया) से खरीदा गया था.



इस थाल पर फारसी भाषा में लिखा है, “ख़ुदाया जहान बादशाह हिरास्त, जमा ख़िदमता यद ख़ुदा हिरास्त, अर्थात, ख़ुदा ही दुनिया का मालिक है, दुनिया के सारे काम ख़ुदा के ही हाथ में हैं.”


उदयपुर से प्राप्त यह शीश भगवान शिव की मुखाकृति है जिसे आठवीं सदी में बनाया गया था.

अल्बर्ट हॉल म्यूजियम में टिकट की दर वयस्कों के लिए 40 रुपये और सात साल से कम के बच्चों के लिए निःशुल्क है.
आज भी जब ऑनलाइन ज्ञान जुटाने का दौर सर पर चढ़ा जा रहा है, म्यूजियम जैसी जगहें अपना एक ख़ास स्थान बरक़रार रखे हैं, इन्हें छात्रों के लिए घूमना और इतिहास के बारे में उनकी दिलचस्पी बढ़ाने के लिए सदुपयोग किया जाना निहायत ज़रूरी है.
ऊपर दी तस्वीरों के अलावा भी और कई चीजें थीं पर समयाभाव की वजह से उनकी तस्वीर न ले सका.
तकरीबन साढ़े पाँच या छः बजे तक हमने अल्बर्ट हॉल म्यूजियम छोड़ दिया और बिड़ला मंदिर की ओर चल पड़े जो पड़ोस में ही था.
यह एक सफेद संग-ए-मरमर का बना हुआ मंदिर है जहाँ शाम को कई लोग घूमने और पूजा-पाठ करने आते हैं.

ये बिड़ला मंदिर का शहर की ओर का हिस्सा है.
इस मंदिर की अंदरूनी दीवारों पर कई पौराणिक वाक़यात चित्र रूप में बनाये गए हैं. इसके अतिरिक्त यहाँ सर्वधर्म समभाव पर भी ख़ास ख़्याल रखते हुए कुछ अन्य मज़हबों के दिव्य विभूतियों की तस्वीरें भी बनाई गई हैं. मंदिर के अंदरूनी भाग में फोटोग्राफी की अनुमति न होने के चलते उपरोक्त चित्रों की तस्वीर लेने का अवसर न मिल सका.
मेरी पत्नी और बेटा

माँ

मैं, मेरी पत्नी और बेटा

बिड़ला मंदिर में कुछ वक्त गुज़ार कर हम जोहरी बाज़ार गए जहाँ कुछ साड़ियाँ खरीदीं और फिर होटल वापिस आ गए.
अब कल का लक्ष्य आसपास के तमाम किले तथा महल घूमना है. उन सबके बारे में आपको बताने को आता रहूँगा.
मेरा इंतज़ार करेंगे न?

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