जाते हैं
इक दिन सब कुछ छोड़छाड़ के,
दुनियावी बंधन तोड़ताड़ के,
बुद्ध की राह पे,
हम चले जाएँगे.
पीछे छोड़ जाएँगे,
ये संगदिल, फ़रेबी,
दोज़ख़ी दुनिया.
तब तुम मुझे न याद करना प्रिये,
क्यूँकि मैं नहीं आऊँगा,
मैं नहीं आऊँगा,
मैं वापिस नहीं आऊँगा.
जाते हैं हम,
तेरी इस बेमुरौव्वत, ग़मकार,
बेरूखी भरी जाहिल दुनिया को छोड़.
जाते जाते इतना सुनते जाओ,
जब कभी जीना भारी लगने लगे,
किसी दरख़्त या बहती पवन से मेरा नाम लेना.
मैं सिर्फ़ ख़्वाबों में मिलूँगा.
क्यूँकि मैं नहीं आऊँगा,
मैं नहीं आऊँगा,
मैं अब कभी वापिस नहीं आऊँगा.
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