सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

दिन पर दिन बीत गए...

कई दिनों बाद इस ब्लॉग पर आने पर इच्छा होती है कि विगत सभी दिनों का ब्योरा लिखें। परंतु यह डायरी तो है नहीं जिसमें सभी घटनाओं का वर्णन करें। इसलिए प्रयास तो यही होगा कि जितनी सुगमता से हो सके लिखा जाए।

पिछली बार जहाँ पर वार्तालाप समाप्त हुआ था तब लेखक कालेज में था। अब तो तीन वर्षों का अंतराल आ गया है। नौकरी करते तीन वर्ष होने को हैं। इस बीच कई प्रसंग हुए। कुछ अनुभव भी हुआ - अच्छे और बुरे की श्रेणी में डालना तो नहीं चाहूँगा पर, सीखने को बहुत कुछ मिला। अब तो कदाचित् इस वर्ष विवाह भी हो। विवाह तो स्वयं में एक अलग अनुभव है, जीवन में कई वृहत् परिवर्तनों में से एक। परंतु इस विषय में अभी इतना ही कहना पर्याप्त है। कभी और इस विषय में विस्तार से चर्चा होगी।

इधर घटनाक्रम पर दृष्टिपात करता हूँ तो पाता हूँ कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वह एक गंभीर वैचारिक उथलपुथल में फंसा है। उच्चाकांक्षाएँ एक दूसरे से टकरा रही हैं। यह उथलपुथल धीरे - धीरे हमें एक ज्वालामुखी के मुख पर पहुंचा रही है। आंतरिक असंतोष धीरे - धीरे उन मूल्यों को खोखला किए जा रहा है जिनपर एक स्वस्थ समाज की नींव रखी होती है। कहते हैं रोग के निदान का प्रथम चरण स्वयं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। तब तो शायद हमें भी भीतर झाँकने की आवश्यकता है।

अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मिलकर करें तो क्या नहीं कर सकते? जरूरत तो ईमानदारी से प्रयास करने की है। आखिर यह सब सिर्फ़ हितोपदेश तो है नहीं। तो चलिए देखें सफलता का मार्ग कहाँ से होकर जाता है।

मयंक आकाश (१० फरवरी, २०१४)