गुरुवार, 29 मई 2014

जनादेश 2014 - महत्वाकांक्षी भारत की अभिव्यक्ति

पिछले दिनों भारत के लोकतंत्र का महापर्व संपन्न हुआ - सोलहवीं लोकसभा के चुनाव। श्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता की लहर पर सवार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 543 में से 337 सीटें पाकर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा पेश किया। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में आम चुनाव के दौरान जैसा वातावरण रहता है, इस बार स्थिति कहीं अधिक गंभीर रही। हालांकि लगभग सभी दलों ने पुराने ढर्रे पर प्रचार किया परंतु नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने कई राष्ट्रहित के विषय उठाकर जनता को इन विषयों पर सूक्ष्मता से विचार करने को प्रेरित किया। फलस्वरूप, जनता ने भी उनके 'भारत विजय' मंत्र पर मुहर लगाई।
जिस प्रकार पुरानी सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खुलती जा रही थी, उससे यह तो निश्चित था कि कांग्रेसनीत सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की स्थिति इस बार अच्छी नहीं थी और कोई चमत्कार ही उन्हें पराजय से बचा सकता था। परंतु संप्रग नेता श्री राहुल गाँधी का व्यक्तित्व जनता को रास नहीं आया। इतने कुछ के पश्चात भी शायद किसी ने भी कभी उम्मीद नहीं की होगी कि वे कांग्रेस की ऐसी स्थिति के गवाह बनेंगे। संप्रग की कुल 60 सीटें आईं जिनमे से 44 कांग्रेस की थी। कुछ राज्यों में कांग्रेस का खाता भी न खुल सका।
अब जबकि नए मंत्रिमंडल ने कार्यभार संभाल लिया है तो देश की राजनीति में आए इस स्पष्ट मोड़ को संभव बनाने वाले एक अतिमहत्वपूर्ण कारक पर दृष्टिपात करना अत्यावश्यक जान पड़ता है। वह कारक है - सोशल मीडिया। अर्थात इंटरनेट पर जनता का आपस में संपर्क। यह कहना कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं समझा जाएगा कि भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी ने जिस सहजता के साथ इस संचार माध्यम का प्रयोग किया वह उनकी विजय का एक महत्वपूर्ण कारण बना। वजह - तेजी से युवा होते इस राष्ट्र के बड़ी संख्या मे युवा फेसबुक, ट्विटर आदि का प्रयोग करने लगे हैं। श्री मोदी ने सीधे इस वर्ग से संवाद स्थापित किया और महत्वाकांक्षाओं से भरे इस वर्ग का जैसा सहयोग उन्हें मिला वह इस विजय में निर्णायक भूमिका से कम नहीं रहा। साथ ही साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से श्री मोदी को अभूतपूर्व सहयोग दिया।
इस विजय ने कई सत्यों को उजागर करने का काम किया है। सर्वप्रथम तो यही कि आज का युवा भारत जितना महत्वाकांक्षी है उतना ही संवेदनशील भी है। अब जो विचार और नीतियाँ इस वर्ग को पसंद नहीं आती उन्हें नकार देने का युवा पीढ़ी ने स्पष्ट आदेश दिया है।
इस बार राजनीति की यह जंग हर मोर्चे पर लड़ी जा रही थी। सोशल मीडिया तो जैसे दो फाड़ हो गया था। यह श्री मोदी के प्रचार अभियान का परिणाम था कि कोई भी तटस्थ रह नहीं सका। जब इस तरह प्रचार किए जाएं तो स्पष्ट जनादेश आना ही एकमात्र निष्कर्ष है - यह चुनाव युवा पीढ़ी को यह पाठ पढ़ा गया। तीस वर्षों के पश्चात किसी दल ने स्पष्ट बहुमत पाया है, यह इसी की परिणति है।
युवा पीढ़ी के हाथों में यह शस्त्र अभी और कितने राजनीतिक दिग्गजों की नौका डुबोएगा यह भी क्या कोई निश्चित होकर कह सकता है।
जितना ऊपर कहा सत्य है उतना ही यह भी कि अब शायद नीति-नियंताओं को आत्मावलोकन की आवश्यकता है। यह युवा पीढ़ी सिर्फ सपने देखने वाली नहीं है, अपितु इस पीढ़ी के पास ऐसा शस्त्र है जो कहीं से भी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। जो पराजित हुए हैं उन्हें तो स्वयं को पुनः प्रासंगिक बनने के लिए प्रयत्न करने ही होंगे अपितु जो जीते हैं उन्हे भी विजय के उत्साह में यह ध्यान रखना होगा कि मुकुट तक पहुँचने के मार्ग से कहीं अधिक दुष्कर होता है शासन चलाना। कंचन के बिस्तर पर कर्मयोग के ह्रास का सदैव भय रहता है। नतीजा - पराजय। और यह एक सत्य है, सार्वभौमिक, परिवर्तनशीलता इसी का दूसरा नाम है।

मराठी लेखक श्री शिवाजी सावंत की अमर कथा 'मृत्युंजय' की एक उक्ति कदाचित् इसी तथ्य पर है-

' यों तो इस संसार में न तो कोई जेता होता है, न ही जित, यही सत्य है।'
इसी प्रकार हम आपको और समाज को अपने कर्तव्यों का भान कराते रहेंगे।
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मयंक आकाश
(मई २९, २०१४)

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

दिन पर दिन बीत गए...

कई दिनों बाद इस ब्लॉग पर आने पर इच्छा होती है कि विगत सभी दिनों का ब्योरा लिखें। परंतु यह डायरी तो है नहीं जिसमें सभी घटनाओं का वर्णन करें। इसलिए प्रयास तो यही होगा कि जितनी सुगमता से हो सके लिखा जाए।

पिछली बार जहाँ पर वार्तालाप समाप्त हुआ था तब लेखक कालेज में था। अब तो तीन वर्षों का अंतराल आ गया है। नौकरी करते तीन वर्ष होने को हैं। इस बीच कई प्रसंग हुए। कुछ अनुभव भी हुआ - अच्छे और बुरे की श्रेणी में डालना तो नहीं चाहूँगा पर, सीखने को बहुत कुछ मिला। अब तो कदाचित् इस वर्ष विवाह भी हो। विवाह तो स्वयं में एक अलग अनुभव है, जीवन में कई वृहत् परिवर्तनों में से एक। परंतु इस विषय में अभी इतना ही कहना पर्याप्त है। कभी और इस विषय में विस्तार से चर्चा होगी।

इधर घटनाक्रम पर दृष्टिपात करता हूँ तो पाता हूँ कि हम जिस समाज में रह रहे हैं वह एक गंभीर वैचारिक उथलपुथल में फंसा है। उच्चाकांक्षाएँ एक दूसरे से टकरा रही हैं। यह उथलपुथल धीरे - धीरे हमें एक ज्वालामुखी के मुख पर पहुंचा रही है। आंतरिक असंतोष धीरे - धीरे उन मूल्यों को खोखला किए जा रहा है जिनपर एक स्वस्थ समाज की नींव रखी होती है। कहते हैं रोग के निदान का प्रथम चरण स्वयं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। तब तो शायद हमें भी भीतर झाँकने की आवश्यकता है।

अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि मिलकर करें तो क्या नहीं कर सकते? जरूरत तो ईमानदारी से प्रयास करने की है। आखिर यह सब सिर्फ़ हितोपदेश तो है नहीं। तो चलिए देखें सफलता का मार्ग कहाँ से होकर जाता है।

मयंक आकाश (१० फरवरी, २०१४)